नज़रिया: 'दंगों पर नरेंद्र मोदी के ही रास्ते पर हैं राहुल गांधी'

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जर्मनी और इंग्लैंड के अपने दौरे में कुछ महत्वपूर्ण व्याख्यान दिए. कई मौकों पर प्रश्नोत्तर सत्र में भी वह चमके. स्वदेश के न्यूज़ चैनलों ने सरकार को खुश करते हुए भले ही उनकी आलोचना की या उनकी कथित नासमझी के लिए उनका मज़ाक उड़ाया पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया और कूटनीतिक हलकों में उनकी बातों में वैचारिकता और ताज़गी देखी गई.
लेकिन शुक्रवार की रात लंदन में वहां के सांसदों और अन्य गणमान्य लोगों की एक संगोष्ठी में उन्होंने जिस तरह सन् 1984 के सिख विरोधी दंगे या कत्लेआम पर टिप्पणी की, उससे उन पर गंभीर सवाल भी उठे हैं.
राहुल ने माना कि सन् 1984 एक भीषण त्रासदी थी. अनेक निर्दोष लोगों की जानें गईं. इसके बावजूद उन्होंने अपनी पार्टी का जमकर बचाव किया.
आख़िर राहुल की इस बात पर कौन यक़ीन करेगा कि सन् 84 के दंगे में कांग्रेस या उसके स्थानीय नेताओं की कोई संलिप्तता नहीं थी.
ये तो कुछ वैसा ही है जैसे कोई भाजपाई कहे कि गुजरात के दंगे में भाजपाइयों का कोई हाथ ही नहीं था. ऐसे दावों और दलीलों को लोग गंभीरता से नहीं लेते. आख़िर ये दंगे क्या हवा, पानी, पेड़-पौधे या बादलों ने कराए थे?
सन् 1984 के उस भयानक दौर में मैं दिल्ली में रहता था. हमने अपनी आंखों से न केवल सबकुछ देखा बल्कि उस पर लिखा भी. उस वक्त मैं किसी अख़बार से जुड़ा नहीं था.
लेकिन पत्रकारिता शुरू कर चुका था. हां, ये बात सच है कि उस सिख-विरोधी दंगें में सिर्फ़ कांग्रेसी ही नहीं, स्थानीय स्तर के कथित हिंदुत्ववादी और तरह-तरह के असामाजिक तत्व भी शामिल हो गए थे.
ग़रीब तबके के लंपट युवाओं को दंगे में लूट-पाट के लिए गोलबंद किया गया. मुझे लगता है इसके लिए किसी को ज़्यादा कोशिश भी नहीं करनी पड़ी होगी. संकेत मिलते ही बहुत सारे लंपट तत्व लूटमार के लिए तैयार हो गए.
उस वक्त मैं दिल्ली के विकासपुरी मोहल्ले के ए-ब्लाक में किराए के वन-रूम सेट में रहता था. मकान मालिक दिखने में शरीफ़ लगते थे पर अंदर से भले आदमी नहीं थे. उनकी पत्नी उनसे बेहतर थीं. यह बात उस दंगे के दौरान ही मुझे समझ आई.
मकान मालिक का परिवार भूतल पर ही भवन के बड़े हिस्से में रहता था और मैं बगल के कमरे में.
हमारे वाले घर के ठीक बगल में जो मकान था, उसके भूतल वाले हिस्से में एक सरदार जी अपने परिवार के साथ रहते थे. उनकी उम्र तब पैंतीस-सैंतीस रही होगी. पहली मंज़िल पर संभवत: कोई चौहान साहब थे.
हम लोगों को ख़बरें मिल रही थीं कि आसपास के इलाकों जैसे तिलकनगर, उत्तम नगर, पश्चिम विहार आदि में दंगे की शुरुआत हो चुकी है. मोहल्ले की दुकानें धड़ाधड़ बंद होने लगीं.
कुछ ही समय बाद हमारे इलाके में भी दंगाई भीड़ दाखिल हुई. भीड़ को मैंने अपनी आंखों से देखा. उसमें किसी पार्टी का कोई जाना-पहचाना नेता नहीं था.
पर ये बात तो साफ़ है कि वह भीड़ यूं ही नहीं आ गई थी. उसके पीछे किसी न किसी की योजना ज़रूर रही होगी. वह भीड़ 'ख़ून का बदला ख़ून से लेंगे' के नारे लगा रही थी. ये नारे कहां से आए? इस बीच जो भी तांडव होता रहा, उसे रोकने के लिए पुलिस या अर्धसैनिक बल के जवान भी नहीं दिखे.
दिल्ली के कई दूसरे इलाकों में लोगों ने स्थानीय सियासी नेताओं को दंगाई भीड़ की अगुवाई करते या पीछे से उकसाते देखा था. इस बारे में पीयूसीएल ने तमाम तथ्यों के साथ एक लंबी रिपोर्ट- दोषी कौन पुस्तिकाकार छापा था.
मेरी गली में दंगाई भीड़ का निशाना सरदार जी का घर था. लोगों के हस्तक्षेप से कि इस मकान में और भी लोग रहते हैं, मकान तो किसी तरह बच गया पर सरदार जी का ट्रक दंगाइयों का निशाना बना. वह धू-धू कर जल उठा.
मेरे कमरे में बैठी सरदार जी की पत्नी की आंखों से टप-टप आंसू गिरते रहे. हम कुछ नहीं कर सकते थे. ठीक वैसे ही जैसे गुजरात के कुख्यात दंगों में असंख्य परिजन या पड़ोस के लोग अपने जाने-पहचाने लोगों का मारा जाना या उनकी संपत्तियों का विध्वंस होता देखते रह गए.
दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में काफ़ी लोगों के मारे जाने की ख़बरें मिलती रहीं पर आम लोग लाचार थे. हत्यारी भीड़ और राज्य तंत्र के बीच एक अघोषित तालमेल दिखा. राजनीतिक विपक्ष का एक हिस्सा भी उस भीड़ और तंत्र के साथ नज़र आया. हाल के वर्षों में भी लोगों के बीच एक तरह की लाचारी है. दादरी के अख़लाक का लाचार परिवार अपने घर के वरिष्ठ सदस्य का मारा जाना देखता रह गया था.
बेटे ने बचाने की कोशिश की तो उसे भी खत्म करने की कोशिश की गई. कुछ ही दिनों पहले मोतिहारी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर संजय कुमार को लिंच करने आई उन्मादी भीड़ के सामने कोई क्या कर सकता था? इन भयावह घटनाक्रमों से सबक लीजिए कि अपने समाज को क़ानून के राज, जनतंत्र, बंधुत्व, उदारता, सहिष्णुता और मानवीयता की क्यों ज़रूरत है.
विकासपुरी में हमारे पड़ोसी रहे वह सरदार जी बहुत साधारण परिवार के थे. मेरी तरह किरायेदार के रूप में वहां रहते थे. ट्रक ड्राइवर थे. कुछ कमाने-धमाने के बाद पहली दफ़ा ट्रक खरीदा था. घर के सामने ही सेबों से लदा नया ट्रक कहीं जाने के लिए खड़ा था.
सामाजिक-आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के दिखने वाले लंपटों की उन्मादी भीड़ ने उस ट्रक के सेबों में कुछ लूट-पाट की. फिर ट्रक को जला दिया.
उन्मादी भीड़ के आने से कुछ ही देर पहले सरदार जी पीछे के दरवाज़े से कहीं निकल गए और अपनी बीवी और बच्चे को मेरे घर छोड़ गए.
उनकी बीवी की मेरी पत्नी से पटती भी थी. हम लोगों ने उन्हें अपने कमरे में बंद कर दिया और बाहर बेड़े में खड़े हो गए. बाद में लौटने पर सरदार जी ने ट्रक का हाल देखा. रोने लगे. पर परिवार सुरक्षित रहा इसका संतोष भी था. मुझे पूरा यक़ीन है कि आज वह सरदार जी कई ट्रकों और गाड़ियों के मालिक होंगे और उनका वह बेटा भी अपना बिज़नेस संभाल रहा होगा.
सरदार जी के परिवार को अपने कमरे में छिपने की जगह देने के हमारे फ़ैसले से हमारा मकान मालिक बहुत नाराज़ हुआ. उसे लगता था कि दंगाइयों को पता चल गया कि यहां सरदार जी का परिवार छिपा है तो वे घर भी जला सकते हैं. मैंने मकान मालिक को समझाया कि किसी को मालूम नहीं होने वाला है, आप बेवजह बवाल कर रहे हो.
कुछ ही दिनों बाद मैंने वह घर छोड़ दिया और पुष्प विहार की तरफ़ आ गया. यह सब इसलिए बता रहा हूं कि आंख से देखे और कान से सुने घटनाक्रमों का अगर कोई 'नया वर्जन' पेश करने लगेगा तो वह गले से कैसे उतरेगा. बेहतर है, लोग अतीत के काले दिनों पर लीपापोती न करें. सच चाहे जितना क्रूर और काला हो, उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाए.
राहुल गांधी ने जब लंदन में कहा कि सन 84 के दंगों में कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं थी तो मुझे गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के वे बयान याद आने लगे जिनमें वह अक्सर कहा करते थे कि दंगों में उनकी सरकार या पार्टी की कोई भूमिका नहीं है. रतिक्रियावश हिंसा हुई और वह 'राजधर्म' का पालन कर रहे हैं. तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन के सख्त तेवर और प्रधानमंत्री वाजपेयी के प्रेषित सुझाव के बावजूद दंगों में झुलसते गुजरात के अंदर सैन्य तैनाती में विलंब किया गया.
तैनाती होने के बाद भी सेना को 'फ़्री हैंड' नहीं दिया गया. सन् 84 और सन् 2002 के बीच इस मामले में अद्भुत साम्य देखा गया. लेकिन दोनों मामलों में नेतृत्व के रुख़ में अंतर भी दिखा.
देर से ही सही, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2005 में संसद आकर 84 के दंगों के लिए और ख़ासतौर पर सिख समुदाय से बिना शर्त माफ़ी मांगी थी.
सोनिया गांधी ने भी अलग मौके पर माफ़ी मांगी थी. फिर राहुल ने बीते 84 की गुनहगार मानी गई पार्टी का बचाव क्यों किया? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह भाजपा नेताओं की तरह अपनी पार्टी की हर ग़लती और हर गुनाह पर पर्दा डालने की भौंडी शैली अख्तियार कर रहे हैं. बार-बार पुरजोर मांग उठने के बावजूद लालकृष्ण आडवाणी या नरेंद्र मोदी जैसे भाजपा के शीर्ष नेताओं ने सन् 2002 के दंगों या अयोध्या में बाबरी ध्वंस के लिए कभी माफ़ी नहीं मांगी.
माफ़ी छोड़िए, ग़लती का एहसास भी नहीं किया. दोनों पार्टियां दंगे के लिए दोषी ठहराए जाने पर अक्सर एक-दूसरे को कोसती हैं. गुजरात का मामला उठाए जाने पर भाजपा के सिख विरोधी दंगे का सवाल उठाकर कांग्रेस का मुंह बंद करने की कोशिश की जाती है.
बर्बरता और क्रूरता को ख़ारिज करने की जगह पर ये पार्टियां अपने पुराने या नए गुनाहों के बचाव का हथकंडा तलाशती हैं. और दंगों के कभी ख़त्म न होने का सिलसिला चलता रहा है. अब दंगों के रूप भी बदल रहे हैं और लोगों पर एकतरफ़ा हमले और मॉब लिंचिंग होने लगी है.

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